शिवसेना शिंदे गुट की दिग्गज राजुल पटेल के सामने कांग्रेस की अनुभव और नए नेतृत्व दिव्या अवनीश सिंह वही से भाजपा से टिकट ना मिलने पर भाजपा की वर्सोवा कि मंडळ अध्यक्षा उर्मिला रवि गुप्ता निर्दलीय मैदान में उतरी
भाजपा कार्यकर्ताओं का निर्दलीय उतरना—युति धर्म छलनी, पार्टी अनुशासन धराशायी, वोट बैंक में भूकंप!अंदरूनी कलह ने चुनाव को बना दिया महाभारत
मुंबई: आतिश तिवारी

बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव 2026 के मद्देनज़र वार्ड क्रमांक 61 में राजनीतिक तापमान अपने चरम पर है। यह चुनावी जंग केवल सामान्य प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सियासी ‘आत्मसम्मान’ और ‘अधिकार’ की लड़ाई में बदलती दिखाई दे रही है। एक ओर शिवसेना (शिंदे गुट) की राजुल पटेल मजबूती से मैदान संभाले हुए हैं। राजुल पटेल कोई नया नाम नहीं हैं वे तीन बार की नगरसेविका रह चुकी हैं। जनसेवा, संगठनात्मक अनुभव और जमीनी पकड़ उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। राजुल पटेल ने 2019 मैं वर्सोवा विधानसभा का चुनाव लड़ी थी, निर्दलीय रूप से जहां वे तीसरे स्थान पर रहीं। इसके बावजूद उनका जनसंपर्क, निरंतर क्षेत्र में सक्रियता और जनता से सीधा संवाद उन्हें वार्ड 61 में एक मजबूत, मेहनती और भरोसेमंद उम्मीदवार के रूप में स्थापित करता है।

तो दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार दिव्या अवनीश सिंह पूरे आत्मविश्वास के साथ जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। दिव्या सिंह भले ही सक्रिय राजनीति में नई हों, लेकिन उनका सामाजिक आधार बेहद सशक्त बताया जा रहा है। शिक्षित, युवा, संवेदनशील और सामाजिक चेतना से परिपूर्ण दिव्या सिंह लंबे समय से सामाजिक सरोकारों, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और जमीनी समस्याओं पर निरंतर काम करती रही हैं। स्थानीय स्तर पर सामाजिक संस्थाओं और नागरिक समूहों के बीच उनकी स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है, जो उन्हें एक उभरती हुई मजबूत दावेदार बनाती है।

वहीं इस मुकाबले को और विस्फोटक मोड़ तब मिल गया जब वर्सोवा विधानसभा मंडळ अध्यक्षा, प्रभावशाली पदाधिकारी और भाजपा से जुड़ी रही उर्मिला रवि गुप्ता ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर पूरी राजनीतिक पटकथा को सुलगते ज्वालामुखी में बदल दिया। वार्ड 61 अब मुंबई का सिर्फ एक और चुनावी वार्ड नहीं रहा, बल्कि यह उस बगावत का प्रतीक बन चुका है जो आज पूरे मुंबई के राजनीतिक तंत्र के भीतर जलती चिंगारी की तरह फैल रही है। भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के भीतर असंतुष्ट नेताओं और नाराज़ कार्यकर्ताओं द्वारा जगह-जगह ‘बंदकोरी’ और निर्दलीय विद्रोह के रूप में चुनावी मैदान में उतरना गठबंधन की स्थिरता पर गहरा सवाल खड़ा कर रहा है। जिस ‘युति धर्म’ का वादा जनता से किया गया था, वह अब खुले आम तार-तार होता दिखाई दे रहा है।
क्या सत्ता और टिकट की राजनीति ने संगठनात्मक निष्ठा को रौंद दिया है? क्या यह विद्रोह गठबंधन के आधिकारिक प्रत्याशियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द नहीं बन जाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वार्ड 61 में मुकाबला अब साधारण नहीं रहा। उर्मिला रवि गुप्ता जैसी मजबूत संगठनात्मक पकड़ रखने वाली शख्सियत का निर्दलीय उतरना केवल एक नामांकन नहीं, बल्कि एक घोषित चुनौती है। इससे वोटों का विभाजन लगभग तय माना जा रहा है, और यह विभाजन किसी एक नहीं बल्कि दोनों प्रमुख प्रत्याशियों—राजुल पटेल और दिव्या अवनी सिंह—के समीकरणों को गहराई से प्रभावित कर सकता है। वार्ड का पूरा गणित बदल चुका है। अब यह सीधी टक्कर नहीं बल्कि जटिल त्रिकोणीय संघर्ष है, जहां हर वोट निर्णायक साबित हो सकता है और जहां हर गलती राजनीतिक भविष्य तय कर सकती है।
इसी के साथ यह भी देखा जा रहा है कि वार्ड 61 की आग केवल यही तक सीमित नहीं रहेगी। शहर के कई अन्य वार्डों में भी यही ‘बंदकोरी’, यही नाराज़गी, यही टिकट असंतोष और यही राजनीतिक अभिमान देखने को मिल रहा है। कई जगहों पर पार्टी के ही पदाधिकारी निर्दलीय बनकर मैदान में कूद पड़े हैं। यह स्थिति केवल चुनावी रणनीति को नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों और गठबंधन की विश्वसनीयता को भी झकझोर रही है।
जनता के मन में यह प्रश्न तेज़ी से आकार ले रहा है कि क्या यह लोकतांत्रिक मजबूती है या राजनीतिक स्वार्थ का चरम? क्या यह नेतृत्व की कमजोरी का संकेत है या संगठनात्मक अनुशासन पर सीधी चोट?
वार्ड 61 की लड़ाई अब केवल सीट जीतने की नहीं रही। यह प्रतिष्ठा, वर्चस्व, संगठनात्मक शक्ति, आंतरिक विद्रोह और राजनीतिक नैतिकता की बड़ी लड़ाई बन चुकी है। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आएंगे, इस वार्ड का चुनावी युद्ध और भी तीखा, और भी गरम, और भी विस्फोटक होने की संभावना है। हर दिन नए समीकरण बनेंगे, हर घंटे नए संदेश जनता तक पहुंचेंगे और हर क्षण यह तय करेगा कि किसके पक्ष में हवा है और किसे यह सियासी तूफ़ान नुकसान पहुंचाने वाला है।
एक बात तो तय है—वार्ड 61 का यह चुनाव सिर्फ एक वार्ड की कहानी नहीं, बल्कि पूरे मुंबई के बदलते राजनीतिक चरित्र की सबसे तीखी और सबसे विस्फोटक तस्वीर बन चुका है।
