मुंबई में उत्तर भारतीयों की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी है भाजपा।
मराठीवाद के दबाव में भाजपा?
मुंबई मनपा चुनाव में उत्तर भारतीय उम्मीदवार 10 से भी कम.
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को फर्श से अर्श तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तर भारतीयों के साथ, मुंबई महानगरपालिका चुनावों में भाजपा का रवैया पूरी तरह उलट नजर आ रहा है। मुंबई मनपा चुनाव में भाजपा उत्तर भारतीय समाज की सबसे बड़ी विरोधी बनकर सामने आई है।
227 सीटों वाली मुंबई महानगरपालिका में भाजपा ने उत्तर भारतीय समाज को 10 से भी कम सीटों पर उम्मीदवार बनाया है। यह तब है, जब मुंबई में उत्तर भारतीयों की आबादी लगभग 60 लाख बताई जाती है, जो शहर की कुल जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा है। इसके बावजूद भाजपा ने कुल सीटों का 10 प्रतिशत भी उत्तर भारतीय समाज को नहीं दिया।
मराठीवाद से भयभीत भाजपा?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल के दिनों में उद्धव ठाकरे गुट (उबाठा) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) द्वारा उठाए गए मराठीवाद के मुद्दे से भाजपा सबसे अधिक दबाव में आ गई है। इसी दबाव के चलते पार्टी संगठन में जुझारू और जमीनी कार्यकर्ताओं की बजाय ‘रबर स्टैम्प’ की तरह काम करने वाले पदाधिकारियों को आगे कर दिया गया।
इसका सीधा असर यह हुआ कि मुंबई भाजपा और मनपा चुनाव समिति में उत्तर भारतीय समाज की आवाज मजबूती से रखने वाला कोई प्रभावी चेहरा ही नहीं बचा। परिणामस्वरूप, उत्तर भारतीय उम्मीदवारों की संख्या 10 के भीतर सिमट गई।
नेतृत्व के सामने चुप्पी
मुंबई भाजपा में पदों पर बैठे उत्तर भारतीय नेताओं की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। पार्टी के भीतर यह चर्चा आम है कि ऐसे नेता मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम और वरिष्ठ नेता आशीष शेलार के सामने अपनी बात रखने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे हैं।
पहली बार इतनी दयनीय स्थिति
राजनीतिक विश्लेषकों और पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुंबई भाजपा में उत्तर भारतीय समाज की ऐसी दयनीय स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई। जिस समाज ने भाजपा को मुंबई और महाराष्ट्र में मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभाई, वही समाज आज टिकट वितरण में सबसे अधिक उपेक्षित नजर आ रहा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर भारतीय मतदाता इस उपेक्षा को स्वीकार करेंगे, या फिर इसका जवाब चुनावी नतीजों में दिखाई देगा?

